Friday, November 12, 2010

"परिवार : संसार का जीवन "

"परिवार : संसार का जीवन "
"परिवार" कितना अर्थपूर्ण शब्द है ..! इसी शब्द से संसार की हर गतिविधि चलती है ! कितने ही रूप होतें है न इस एक शब्द के ..! नि:स्वार्थ , स्वार्थ , परोपकार , कर्तव्य , बलिदान , नैतिकता , अपराध , पुण्य , भक्ति आदि ..! अनेक शब्दों की परिभाषा होता है यह शब्द ! शायद यही एकमात्र शब्द है जिसके इतने पर्याय हैं , अर्थ हैं ! वर्ना संगीत के सात सुर होतें है ! रस नौ प्रकार के होतें हैं ! कामक्रीडा के चौसंठ आसन होतें है ! चार वेद , नौ उपनिषद , सात महाद्वीप , ताश के बावन पत्ते आदि अनेक की कोई सीमा जरूर होती है ..! परन्तु 'परिवार' की सीमा नि:सम्मी होती है ! जैसे आकाश में अनंत तारे , पेड़ों की पत्तियां , धरती के असंख्य कण...आकाश में अनगिनत बादलों के झुण्ड ..! ठीक यही अर्थ भी परिवार पर लागू होता है न ..! आकाश के तारे... कोई कम चमकीला तो कोई ज्यादा , कोई छोटा तो कोई बड़ा ..! और जब तारे एक साथ रोशन होतें है तो अँधेरा दूर भाग जाता है ..! ठीक यही बात भी परिवार पर भी लागू होती है न ...! जब परिवार एक होता है तो निराशा दूर हो जाती है! कितना अजीब है न यह सब ...!
परिवार की शुरुआत दो अंजन से होती है ...उनमे प्यार होता है ..प्यार परवान चड़ता है ...एक होतें है ...और शुरू होता है परिवार ..! समय चक्र की गति से भी तेज गति से परिवार बढता है .! समय के साथ बढता यह परिवार आपस में दूरियां भी बनता है न ..! जैसे आकाश में तारों के बीच , वृक्षों की पत्तिओं के बीच , आकाश में बादलों के बीच दूरियां ...जो कभी ख़त्म नहीं होतीं ! जब आकाश में बादलों के झुण्ड आपस में टकराते हैं तो गडगडाहट से बिजली चमकती है और बरसात होती है ! इसी तरह परिवार में जब दो 'अहं' आपस में टकराते हैं तो विखंडन होता है ...! परिवार में केवल एक ही सम्बन्ध अटल रहता है और वो है - 'पति- पत्नी ' का ! जैसे आकाश में चाँद -तारे का , वृक्ष में पत्तियों और डाली का , ..! शेष सभी रिश्ते समय के साथ दूरियां बनातें हैं वैसे यह दूरियां सही भी है न ..! तभी तो नए परिवार की शुरुआत होती है ..! अब परिवार से दूरी उनकी मर्जी से बनाये या स्वयं की हिम्मत से बनाये ! बनाना तो परिवार ही होता है न ! आपसी विश्वास , समर्पण और सहयोग इसकी धड़कन होती है न .! जैसे तने से डालियाँ तब तक जुडी होती हैं जब तक उन पर ताकत का उपयोग न किया जाये ! ठीक इसी तरह यह सम्बन्ध भी मृत्यु रूपी शक्ति से ही अलग हो सकता है ..!

तो क्यों न परिवार से अपने साथ- साथ प्रक्रति के जीवन में भी नई जान डालतें रहें ...! ता कि यह दुनियां इतनी सुन्दर हो कि बार-बार इसमें आने का मन करे ....! दिल करे ...!! सच कह रहा हूँ न मैं ...!!!
तो अब इतना ही फिर मिलूँगा एक नए विषय के साथ ...!!!! "- मनु भारतीय"

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