Friday, November 26, 2010

" मुखड़ा तुम्हारा "

" सुनहली रश्मिओं में ,
ओस के धुंध के ,
आलिंगन में -
मुखड़ा तुम्हारा -
रक्तिम हो उठता है !

मीठी -मीठी सी शीत में ,
सिरहते उन पलों के ,
नैसर्गिक मिलन में -
तुम्हारा रूप -
समर्पित सा हो उठता है !

नन्ही - नन्ही कोमल दूब में ,
ओस -कणों रूपी दर्पण में ,
प्यार की चमक में -
मुखड़ा तुम्हारा -
मेरे जीवन का दर्पण बन जाता है !"
"-... मनु "

1 comment:

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