Tuesday, December 28, 2010

सकारात्मक दृष्टिकोण

" हमे कभी कभी लगता है न हमारा कोई काम होने वाला था पर नहीं हुआ ? हम सोचतें हैं कि उस काम को करने में हमसे कोई त्रुटी तो नहीं हुई .? पर बहुत सोचने के बाद हम तय करतें हैं न कि हमसे तो कोई गलती नहीं हुई फिर काम क्यों नहीं हुआ ? दरअसल होता यह है कि जब हम उस काम को कर रहे होते हैं, तो हम काम तो कर रहे होते हैं, पर अपने अन्दर अपने काम के प्रति सकारात्मकता के स्थान पर यह सोचतें है -कि पता नहीं हमारा यह काम होगा या नहीं ..? और इस अनिश्चितता के कारण न केवल हमारे अन्दर नकारात्मक भाव बढते हैं , अपितु काम के होने में भी रूकावट बन जातें हैं ! और जब काम नहीं होता, तो हम उस समय सोचतें हैं - कि काश उस समय हम अच्छा -अच्छा सोचते तो काम हो जाता ! यही अच्छा -अच्छा सोचना ही सकारात्मक भाव होता है , फिर हम सोचतें है आहिंदा हम सकारात्मक ही सोचेंगे ..! पर फिर हम भूल जातें हैं क्यों कि हम इसे अपनी आदत में या मानसिकता में ढाल नहीं पाते न ..! यह तो हुई कि हमारे कामों के सही ढंग से होने में सकारात्मक भाव की अहम् भूमिका होती है !
अब आते हैं इस सकारात्मक भाव का असर कितना अच्छे से हो सकता है ? यदि हम किसी चीज को पाना चाहतें है तो हमे अपने दिमाग में उसकी तस्वीर बनाये रखनी चाहिए और सोचना चाहिए हमे यह चीज मिल ही जाएगी ! यदि हम लगातार ऐसा करते है और फिर उस चीज को पाने का प्रयत्न करतें हैं तो निश्चित मानिये हमे वह चीज मिल ही जाती है ! तब हम खुश होते है कि हमे कितनी आसानी से चीज मिल गई! दरअसल होता यह है कि हमारे लगातार सोचने से , अपने दिमाग में उस वस्तु की तस्वीर बनाये रखने से हमारे आस -पास सकारात्मक उर्जा का वातावरण बन जाता है और यही वातावरण उस चीज को पाने की लालसा में जूनून पैदा करता है , और यही जूनून वस्तु पाने की सही दिशा बनता है ! और हम उस वस्तु को पा लेतें है !
हमारे आस -पास कितने ही ऐसे उधाहरण होते है जो सकारात्मक भाव से अपने सब काम करतें है ! हम उन्हें देख कर कहतें हैं कि - इनके सब काम कितनी आसानी से हो जाते हैं ..? उनके सब काम आसानी से होने के पीछे यही सकारात्मक भाव ही होता है ..! यही बात रत्नों पर भी लागु होती है ! जब हमे कोई ज्योतिष या रत्नों का जानकर हमे रत्न देता है यह कह कर कि इसे धारण करने से आपके सब काम अच्छे से होंगे साथ ही मन भी शांत रहेगा ! हम उस रत्न को सकारात्मक भाव से धारण करतें है और अपने काम उस रत्न को याद कर करते हैं और जब हमारे काम सफल होते है तो उसका श्रेय उस रत्न को देते है कि हमने वह  रत्न पहना तो हमारे काम सही ढंग से हुए ! दरअसल होता यह है कि वह रत्न तो केवल माध्यम होता है हमारे अन्दर सकारात्मक भाव बनाये रखने का ! ऐसे अनेक माध्यम हमें प्रेरित करते है कि हम अपने अन्दर सकारात्मक भाव सदा बना रहे ..! जैसे भगवान की भक्ति , संकीर्तन करना , बड़े - बुजुर्गों द्वारा अच्छे वचन कहना ...आदि आदि ..!
तो उम्मीद करूँ न कि कम से कम इस आने वाले नए साल में हम यह प्रण ले कि हम अपने सब कम अपने अन्दर सकारात्मक भाव बना कर करेंगे !!!
"... - मनु "

Monday, December 27, 2010

नया वर्ष शुभ हो ...!


" जब भी लगभग ३६५ दिन बीतते हैं , नया साल आता है ! और फिर शुरू होता है एक -दूजे को नए वर्ष की शुभकामनाये देने का दौर ..! यह दौर नया साल आने से एक सप्ताह पहले शुरू होता है जो नया साल आने के बाद लगभग एक सप्ताह तक चलता है ! सब चाहतें है उनका नया साल अच्छा बीते ..! साल के शुरू में तो जोश बना रहता रहता है पर जैसे -जैसे साल अपनी रह पर आगे चलता जाता है जोश कम होने लगता है ..! खैर इन बातों को अभी तो छोड़ते हैं अभी तो नया साल आने वाला है ..! तो सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें ...आप सभी के जीवन में सब तरह की खुशिओं का आगाज़ रहे ...आप मुस्कुराते रहें और अपनी हर कठिनाई को सरल बनातें रहें ..! आपसे सभी खुश रहें ...!! आपके कामों से न केवल आप , आपका परिवार और हमारा यह भारत देश भी प्रगति करता रहे ...! इन्ही कामनाओं के साथ ......"
"... -- मनु "

Saturday, December 25, 2010

" दर्द की दवा "

" दर्द  का  अहसास  छुपा  ही  रहने  दो ,
क्योंकि  उसे  छुपाने  में  ही  मज़ा  है  !
मुस्कुरा  सकते  हो  जितना  मुस्कुरा  लो ,
क्योंकि  मुस्कुराना  दर्द  की  दवा  है  !!"

Wednesday, December 15, 2010

" उमंग "

"मन  की उमंगो  को  बहने  दो  समुन्द्र  की  तरह ,
रिश्तों  को  चमकने  दो  चांदनी  की  तरह  !
क्या  मालूम  कब  अपना  हो  जाये  कोई  परछाई की  तरह ,
दिल  को  मुस्कुराने  दो  खिलते  फूलों   की  तरह  !!"

" - .. मनु "

" उमंग "

"मन  की उमंगो  को  बहने  दो  समुन्द्र  की  तरह ,
रिश्तों  को  चमकने  दो  चांदनी  की  तरह  !
क्या  मालूम  कब  अपना  हो  जाये  कोई  परछाई की  तरह ,
दिल  को  मुस्कुराने  दो  खिलते  फूलों   की  तरह  !!"

" - .. मनु "

Monday, December 13, 2010

" संतों की वाणी "

" कुछ संतों ने अपनी वाणी में कुछ ऐसी -ऐसी बातें कहीं हैं , जिन पर समय का कोई असर नहीं होता ..! अर्थात समय कैसा भी हो वे बातें ऐसी लगतीं हैं जैसे आज के समय की हों और आज के समय के लिए सही हैं ..? शायद इसलिए तो कहतें हैं न ..संतों की वाणी में छुपे अर्थ को हमेशा मन में ग्रहण करना चाहिए , और जब हमे लगे कि हमारे जीवन में कोई उहापोह की स्थिति आ रही है तो वही वाणी हमे ऐसा रास्ता दिखा देतीं हैं,  कि हमे अपने पर विश्वास हो जाता है, कि हम उन्हें आसानी से दूर कर सकतें है ...! आज मैं एक ऐसे ही संत की वाणी के कुछ अंशों को प्रस्तुत कर रहा हूँ , जो कभी भी , किसी भी कठिनाई को दूर करने में हमारे आत्मविश्वास को मजबूत करने में सहायक होतीं हैं ! उन संत का नाम है -- ओशो यानि आचार्य रजनीश ,
संकल्प आपको कार्य करने के लिए प्रेरित करता है ! फिर आप वही बन जातें हैं जो आप बनना चाहतें हैं ! संकल्प , पक्का इरादा और मजबूत हौसला भी तैयार करता है ! तो सोचिये इनकी जरुरत किसे नहीं होगी .......! टालसटाय ने कहा था कि- " आप अपने लक्ष्य के अनुरूप व्यवहार करें , फिर ईश्वर आपकी सहायता के लिए खुद उतर आयेंगे ! इसके बाद आपको अपनी उन आदतों को बदलने की कोशिश करनी होगी , जो आपको अपने लक्ष्य से डिगा सकती हैं ! जैसे - नकारात्मकता !" इसलिए हमे हमेशा अपने लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए , अर्थात हमे अपने जीवन में क्या करना है जिससे हमारा जीवन सार्थक हो सके!
" जब भी आप अपनी उम्र को खुद पर हावी होने का मौका देंगें , तब आप बहुत से अवसरों का लाभ उठाने से चूक जायेंगें ! इसलिए उम्र के लिहाज से काम करने के बारें में सोचना बंद कर दें ! और तुरंत संकल्प लें कि हम अपनी इस सोच को बदल कर ही दम लेंगे ..!" अर्थात होता यह है कभी - कभी कि हम कुछ ऐसा करना चाहतें है जो सबके लिए और हमारे लिए अच्छा हो सकता है पर हम यह सोच कर रह जातें हैं कि उम्र के लिहाज से शायद यह सही न हो ...? बस यह सही नहीं होता ..अब यदि हम ऐसा कुछ कर जाएँ उम्र का लिहाज किये बिना तो ...सभी उस किये गए कार्य कि प्रशंसा ही करेंगे न ..! हाँ यहाँ एक बात की तरफ ध्यान देना जरुरी होता है कि कहीं हमारे स्वास्थ्य , मन या परिवार को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा ..!
" लम्बी बहसों से दूर रहने वाले लोग हमेशा खुश रहतें है ! क्योंकि वे क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते ! फिर उनका दूसरों के साथ करीबी रिश्ता बन जाता है ! दूसरों के नजरिये को समझिये और उनके करीब रहने की कोशिश कीजिये ! " यानि सबसे पहले तो लम्बी बहस करने से बचना चाहिए , क्योंकि लम्बी बहस जिस विषय से शुरू होती है वह धीरे - धीरे अपने विषय से दूर होती जाती है , और अंत में निर्णय कुछ निकलता नहीं है , ऐसे में हम खुद भी तो कहतें है न कि - इतनी बातें की पर नतीजा कुछ नहीं निकला ..!
" आपका मस्तिक्ष बहुत से स्त्रोतों से विचारों को ग्रहण करता है ! इसलिए यह  आसान नहीं होता कि आप अपने पहले से मौजूद विचारों को बदल सकें ? लेकिन कल्पना शक्ति का विस्तार करने के लिए उन विचारों को छोड़ना पड़ता है ! फिर आपके मस्तिक्ष में नए विचार आना शुरू हो जातें हैं ! " यानि हमे हमेशा अपने अनुभवों को प्राप्त की गईं जानकारिओं को बांटते रहना चाहिए , साथ ही अपने अन्दर कल्पना शक्ति को भी बनाये रखना चाहिए तभी हम कुछ नया सोच पायेंगें न ..!
अपने भीतर के बच्चे को हमेशा जिन्दा रखे ! तब वह आपको जीवन के हर मोड़ पर मिलने वाली छोटी - बड़ी खुशियों का आनंद उठाने के काबिल बनाएगा ! यदि आप उसके जादू से वाकिफ होना चाहतें हैं तो अपने अन्दर के बच्चे को हमेशा जिन्दा रखें !" यानि जैसे बच्चा होता है न जो हर बात में जिज्ञासु होता है , छोटी - छोटी खुशियों में खुश रहता है ...उसमे दर नाम की चीज नहीं होती ...कोई भी काम करने में हिचक नहीं होती ...वह यह नहीं सोचता की उस काम का अंजाम क्या होगा ..! वह तो अपने पूरे मन , लगन और हसंते हुए काम करता है ..! इसी को तो कहतें है न कि अपने अन्दर बच्चे को जिन्दा रखना ..!
बस यही कुछ बातें है न जिन्हें हम अगर हमेशा याद रखें तो सोच कर देखिये ..क्या कभी हमे कठिनाई का सामना करने में कोई दिक्कत होगी ..! नहीं न ..!! "
(सीक्रेट आफ सक्सेस से साभार )

" - ... मनु "

Sunday, December 12, 2010

" जीवन की ख़ुशी "

 " ख़ुशी को हम जितना लुटाएंगे , उतना ही वह हमारे करीब आएगी ! कभी सफलता के रूप में तो कभी सम्पन्नता के रूप में ! इसलिए खुश रहना अपने अन्दर आत्मविश्वास मजबूत करने का माध्यम भी है ! जब हम अपनी आंतरिक योग्यताओं को पहचान लेतें हैं और फिर उन्हें आधार बना कर आगे बढतें हैं तो हमे ख़ुशी और कामयाबी साथ -साथ मिलती है ! कहतें है न - " जिंदगी छोटी है मगर खोटी नहीं ! इसलिए छोटी - छोटी बातों में फंसकर जिंदगी को बर्बाद नहीं करना चाहिए !" और जिंदगी को आबाद करना और उसे खुश रखना हमारे स्वयं के नियंत्रण में है न ..! करना ज्यादा कुछ नहीं है केवल - अपने अन्दर आत्मविश्वास का दीपक जलाये रखें , ख़ुशी का प्रदर्शन हंसी से करना ! क्योंकि जहाँ हंसी है वहां सफलता है ! इसलिए हंसी से अपनी आंतरिक प्रसन्नता को व्यक्त कीजिये ! ख़ुशी - आनंद , जुडाव और औचित्य पर निर्भर होती है ! इसलिए तुरंत अपने अन्दर इस बात को महसूस कीजिये कि क्या इन तीनों का सही अनुपात आपके अन्दर है ? साथ ही नियमित भोजन , शांत रहना और प्रसन्नचित मन बनाये रखना भी हमारे जीवन को खुश रखता है न !
तो हम सभी चाहतें हैं न कि हम भी खुश रहें चाहे कितने भी कठिन हालत क्यों न आ जाएँ ...और यह सब करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना होगा न , तो ऊपर जो लिखा ...उस पर विचार कीजियेगा ..अच्छा लगे तो पालन कीजियेगा ! हो सकता है आप भी खुश हो जाएँ ..तो आपके आस - पास सभी आपको खुश देख कर खुश हो जायेंगे न ..! "
इस बार इतना ही ---

" - ... मनु "

Saturday, December 11, 2010

" भरोसेमंद सहयोगी का साथ सफलता का सूत्र "

"भरोसेमंद सहयोगियों की तलाश मुश्किल नहीं होती !मुश्किल होता है तो उसका विश्वासपात्र होना !! सहयोगी अगर विश्वसनीय है , तो व्यापक सफलता के साथ मुश्किल कम भी आसान हो जातें हैं !!! हम कोई भी काम करें - चाहे वह व्यापार हो , घर में कोई मांगलिक कार्य हो , किसी भी तरह का धार्मिक आयोजन हो ...! इन सबकी सफलता का सूत्र केवल एक ही होता है और वह है - भरोसेमंद सहयोगियों का साथ होना ! यदि ऐसे सहयोगी साथ है तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता ! वह इतनी आसानी से हो जाता है , कि सहसा विश्वास नहीं होता ! यदि सहयोगी भरोसेमंद नहीं है , तो कोई भी सफल होता हुआ काम असफल भी हो जाता है ! फ़िल्मी दुनियां से शुरू करें , बहुत साल पहले - गीतकार शैलेन्द्र , संगीतकार शंकर जयकिशन , गायक मुकेश , नायक राजकपूर एक दूसरे के भरोसेमंद सहयोगी हुआ करते थे , देखिये उनकी फिल्मे - मेरा नाम जोकर , आग, आह , श्री चार सौ बीस , आवारा कितनी सफल रहीं साथ ही उनके गीत आज भी हम गुनगुनातें है न ..! व्यापार में देखें तो सहारा श्री को भरोसेमंद सहयोगी मिले तो साधारण बैंकिंग से आज एक महत्वपूर्ण नाम है न ...! परिवार में देखें तो पति -पत्नी के आपसी सहयोग से हम शिक्षित होतें हैं और अपने जीवन में स्थापित होतें है यदि उनमे सहयोग न हो तो ..? कहने का तात्पर्य इतना है है कि हम कोई भी काम करें , विश्वसनीय सहयोगी का साथ होना जरूरी है ! पर हाँ यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है , कि हम अपने सहयोगी का विश्वास जीत पातें हैं या नहीं ? बस यही थोडा मुश्किल है ..!
अपने सहयोगी के विश्वास को जीतने के लिए सबसे पहले हमे उसके बारे में पूरी जानकारी , उसके स्वभाव , पारिवारिक पृष्ठ भूमि की जानकारी सहित उसकी कार्यक्षमता को भी देखना होता है ! यदि हम संतुष्ट हैं, तो उसके बाद हमे ज्यादा कुछ नहीं करना चाहिए ! बस उसे अपने काम के बारे में और भविष्य की योजनाओं की जानकारी देनी चाहिए और अपनी - अपनी स्वतंत्रता  , लगन और आत्मविश्वास से कार्य करना चाहिए ! हमारा व्यव्हार ऐसा होना चाहिए,  जिससे हमारे सहयोगी को ऐसा न लगे कि हम उसका गलत फायदा उठा रहें है !
अगर हम इतना कर पातें है न...तो सच मानिये हम कोई भी काम करेंगे न... उसमे सिर्फ और सिर्फ सफलता ही मिलेगी ! हाँ ! एक बात का और ध्यान रखना होगा न कि एक दूजे के जीवन के सुख - दुःख के पलों में एक दूजे का साथ दें ! बस इतना ही तो करना होता है , फिर सफलता कहाँ है  दूर ........सोचिये ..???
आज बस इतना ही -!"

" - ... मनु "

Friday, December 10, 2010

" जीवन जीना शुरू करें...!"

" जीवन भी कितना अजीब होता है न ...! समझ में नहीं आता हम जीवन जीतें हैं या जीवन हमे जीता है ..? कभी - कभी हमे लगता है कि हम जीवन को जीना जानतें है ? पर कभी लगता है न कि हम जीवन को समझ ही नहीं पाए  ? साथ ही कुछ रिश्ते ऐसे भी होतें है न ...जिन्हें हम समझ नहीं पाते और कहते है न कि काश ...हमे भी मिल जाती खुशियाँ ..जैसे अन्य को मिलतीं है ? अब यदि हम कुछ रिश्तों को बनाने में कुछेक सामान्य बातों को ध्यान में रखें तो निश्चित रूप से हम भी वह खुशियाँ पा सकतें है, जिन्हें हम अपने मन में सोचतें हैं !

'
दोस्ती '
हमारे जीवन में भी एक अच्छा दोस्त हो या अनेक हों , हम यही सोचतें है न ...! तो अगर हम दोस्ती करने से पहले या दोस्ती करने पर कुछ बातों को अपने मन में रखें और उनका पालन करें तो हमे भी अच्छे दोस्त मिलेंगे - " दोस्ती हरदम एक मीठी जिम्मेदारी होती है , न कि लाभ पाने का एक सुनहरा अवसर ! ' आस्था दिल की गहराइयों में समाया हुआ ज्ञान होतीं है , सबूतों की पहुँच से परे ..! " बस इनको मन में बसा कर रखें और इनके अर्थ को अपनी दोस्ती में पिरो ले तो हम भी कह उठेंगे न कि -हमारे पास भी अच्छे दोस्त हैं !

" प्यार " , हमारे जीवन में एक ऐसा पल भी आता है न जब हम किसी से प्यार करने लगतें हैं ! पर कभी - कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है कि हम स्वयं ही कह उठतें हैं कि काश हमे भी प्यार की खुशियाँ मिल गईं होतीं ? अब यदि हमने  प्यार करते समय अपने मन में इन बातों को रखा होता या पालन किया होता तो हम यह शब्द नहीं कह रहे होते न ..! "प्यार तब  तक अपनी गहराई नहीं जानता, जब तक कि अलगाव की घडी न आ जाये ! " ," किसी से प्यार करो , पर प्यार को बंधन न बनाओ ! आत्मा की लहरों के बीच प्यार के समुन्दर को बहने देना चाहिए ! ' ,' जब हम किसी से प्यार करतें हैं और वह जाना चाहे तो उसे जाने देना चाहिए ! यदि वह वापस आये , तो वह हमेशा हमारा ही रहता है ! यदि वापस न आये तो मन लेना चाहिए कि वह कभी हमारा था ही नहीं ! " अगर हम इन बातों को मन में रखेंगे न तो हमे भी प्यार कि खुशियाँ मिलेंगी , यदि किसी कारण न भी मिली तो हमारे मन को कोई ठेस भी नहीं लगेगी न ..!

बस इतनी सी बातें होतीं है न जिन्हें हम अपने मन में रखें और उन पर अमल भी करें तो न केवल मन खुश रहेगा बल्कि कुछ अनहोनी होने पर मन विचलित भी नहीं हो पायेगा न ..!

" - ... मनु "

Thursday, December 9, 2010

" बोलना एक कला है "

" बोलना वास्तव में एक कला है , जो कई बिगड़े और मुश्किल भरे कामों को भी आसानी से हल कर देता है ! बोली के माध्यम से हम एक दूसरे से बातचीत करने के साथ -साथ विचारों का भी आदान -प्रदान करतें हैं ! यदि हमारी बोली प्रभावपूर्ण है तो दूसरों को आसानी से आकर्षित कर लेती है ! चाहे साधू -संत हों , नेता -अभिनेता हर इन्सान अपनी बोली से अपनी एक अलग छाप छोड़ता है न ! उदाहरण के लिए - अमिताभ बच्चन  को ही ले तो उनकी बोली या आवाज में इतना आकर्षण है कि हर कोई उनका दीवाना हो जाता है ! ऐसे ही अनेक उदाहरण  हैं न ..! कभी -कभी हमारे मन में भी आता है न कि हम भी ऐसा बोलें कि सब हमसे प्रभावित हों ? यह हो भी सकता है , बस हमे थोड़ी सी कोशिश करनी होगी ! कुछ अपने अन्दर बदलाव करने होंगे !! कुछ बातों का पालन करना होगा !!! अगर हम यह कर लेंगे तो हमारे बोलने से न केवल सब खुश होंगे बल्कि हमे खुद को भी अच्छा लगेगा !
*-- जब हम बातें करें तो अपनी आवाज पर ध्यान देना चाहिए , जो न तो बहुत तेज हो न ही बहुत धीमी !
*-- बोलते समय ध्यान दे कि सुनने वाला हमारी बातों को समझ रहा है , उसमे जल्दबाजी न हो , शब्दों का चयन अच्छा हो , कहाँ विराम देना है इसका ध्यान हो ..और हाँ साथ ही इसका भी ध्यान हो कि बोलते समय हम कहीं शब्दों में अटक तो नहीं रहे !
* -- शब्दों का उच्चारण सही होना चाहिए , व्याकरण की गलतियाँ न हो ! यदि ऐसा हुआ तो बोलने में अर्थ का अनर्थ होने में देर नहीं लगेगी और हम उपहास का पात्र बन जायेंगे !
* -- बोलने के पहले हम किस विषय पर बोल रहें हैं उसके बारें में पूरी जानकारी होनी चाहिए , उस विषय के बारे में महान चिंतकों के सूत्र वाक्य , मुहावरे , कहावतें , या रोचक घटनाओं की जानकारी हमारे मन में मस्तिक्ष में होनी चाहिए ! ता कि जब हम बोलना शुरू करें तो कहीं अटकें नहीं !
* -- बोलते समय हमारे चहरे के भाव , शरीर के  हाव -भाव ऐसे होने चाहिए कि सुनने वाले को या देखने वाले को ऐसा न लगे कि हम कुछ ज्यादा अपने आप को दिखा रहे है , सामान्य रह कर और विषय के अनुसार अपने हाव - भाव बदलते  रहें ! आवाज में विषय के अनुसार स्वर या रस का प्रयोग करें - यानि कहीं मुस्कुराने की बात हो तो अपने चेहरे पर मुस्कराहट लायें , इसी प्रकार अपने चेहरे के भाव विषय के अनुसार बदलते रहें !
बस इतना  ही तो करना है ...इतना करने से हमारे बोलने से न केवल सब खुश होंगे अपितु हम स्वयं भी संतुष्ट होंगे न ..!
चलिए आज इतना ही ...! "
" - ... मनु "

" चंचल मानव मन "

" जीवन में हम पता नहीं कितने लोगों  से मिलतें हैं पर हमे सब याद नहीं रहा पाते , हाँ कुछ लोग अपनी विशिष्ट पहचान के कारण याद रह जातें है ! हमारा मन करता है न कि ऐसे लोग हमारे जीवन  में हमेशा बने रहें ! साथ ही हम कोशिश भी करतें हैं न कि हम सदा ऐसे लोगो से मिलते रहें ! इसी के लिए हम अच्छे काम भी करतें हैं ! मीठी - प्यारी बातें भी करतें हैं ! इसी लिए न कि हमारे आस -पास अच्छे लोगो का वातावरण बना रहे ! चलो यह तो हुई अपने आस - पास अच्छे -अच्छे लोगों के बनाये रखने की बात ..!
पर हमारे जीवन में कुछ पल ऐसे भी आतें है जब कोई हमें इतना प्रभावित कर देता है कि वह हमारे लिए सबसे अलग हो जाता है ! लगता है जैसे वह हमारा सच्चा साथी है ! हम हमेशा चाहतें है न कि हमारे जीवन में एक ऐसा साथी जरूर हो , जिस पर हम विश्वास करें और वह हम पर विश्वास करे ! मानव मन भावुक होता है न , कोई पसंद आ गया तो उसके लिए मन में भावनाएं उमड़ती हैं , प्यार आता है , मन करता है वह सदा साथ रहे ! कभी भी दूर न हो !! और यदि कोई पसंद न आये तो मन करता है कि हम फिर कभी उसे न देखें , बात भी न करें ! यही तो मानव मन की विशेषता है न ...!
इसलिए सच है न कि --

" जो आपकी जिंदगी बदल दे , आपमें बदलाव लाये और आपकी सहायता करे , वही आपका सच्चा साथी है !"
"- ... मनु "

" चंचल मानव मन "

" जीवन में हम पता नहीं कितने लोगों  से मिलतें हैं पर हमे सब याद नहीं रहा पाते , हाँ कुछ लोग अपनी विशिष्ट पहचान के कारण याद रह जातें है ! हमारा मन करता है न कि ऐसे लोग हमारे जीवन  में हमेशा बने रहें ! साथ ही हम कोशिश भी करतें हैं न कि हम सदा ऐसे लोगो से मिलते रहें ! इसी के लिए हम अच्छे काम भी करतें हैं ! मीठी - प्यारी बातें भी करतें हैं ! इसी लिए न कि हमारे आस -पास अच्छे लोगो का वातावरण बना रहे ! चलो यह तो हुई अपने आस - पास अच्छे -अच्छे लोगों के बनाये रखने की बात ..!
पर हमारे जीवन में कुछ पल ऐसे भी आतें है जब कोई हमें इतना प्रभावित कर देता है कि वह हमारे लिए सबसे अलग हो जाता है ! लगता है जैसे वह हमारा सच्चा साथी है ! हम हमेशा चाहतें है न कि हमारे जीवन में एक ऐसा साथी जरूर हो , जिस पर हम विश्वास करें और वह हम पर विश्वास करे ! मानव मन भावुक होता है न , कोई पसंद आ गया तो उसके लिए मन में भावनाएं उमड़ती हैं , प्यार आता है , मन करता है वह सदा साथ रहे ! कभी भी दूर न हो !! और यदि कोई पसंद न आये तो मन करता है कि हम फिर कभी उसे न देखें , बात भी न करें ! यही तो मानव मन की विशेषता है न ...!
इसलिए सच है न कि --
" जो आपकी जिंदगी बदल दे , आपमें बदलाव लाये और आपकी सहायता करे ,
वही आपका सच्चा साथी है !"
"- ... मनु "

Tuesday, December 7, 2010

" रूठना मुझसे "

" घिर कर आती घटाओं से ,
जब पूछता हूँ नाम तुम्हारा -
कलियाँ रूठ जातीं हैं मुझसे !

मचलते निर्झरों की मदहोशी से ,
जब पूछता हूँ पता तुम्हारा -
कल्पनाएँ रूठ जातीं हैं मुझसे !

मौसम की छलकती जवानी से ,
जब पूछता हूँ सौन्दर्य -रहस्य तुम्हारा -
कामनाएं रूठ जातीं हैं मुझसे !

इसलिए तो कहता हूँ तुमसे ,
अगर मिल जाये प्यार तुम्हारा -
यह सब हो जायेंगे खुश मुझसे ! "

" - ... मनु "

" डाली "

" सुबह की पहली -
किरण के आंचल में ,
पुष्पों का सौन्दर्य -
अद्वितीय हो उठता है !

घटाओं की प्यारी सी -
भीगती नन्ही -नन्ही बूंदों में ,
डाली के प्यार से -
पुष्प खिल उठता है !

जीवन में किसी के -
प्यार भरे आँचल में ,
दिल का चमन -
खुशियों से महक उठता है !"


" - ... मनु "

Monday, December 6, 2010

" जीवनास्तित्व "

" क्षितिज सी अनंतता लिए ,

   एक लम्बी सी पगडण्डी ,
 
वीरान उदास सी -
  विभिन्नता सामान जिंदगी है !



सफलता , उम्मीद , प्रतीक्षा ,
यह कुछ रूप ,
अनेक स्वरूपोस्तित्व परिपूर्ण -
रेगिस्तान में मृगतृष्णा सी जिंदगी है !


संबंधों की डोर में ,
अजीब से उलझावपन में ,
संघर्ष , कोशिश , हिम्मत से -
स्वयं को सुलझाती सी जिंदगी है !


क्षणिक से समयांतराल में ,
अपने विशालास्तित्व पूर्णता से ,
बचपन , जवानी , बुढ़ापे से -
शनै - शनै गुजरती सी जिंदगी है ! "


" - ... मनु "

" लिखना संतुष्टि देता है मन को ....!"

" किसी भी तरह का ज्ञान हो या अविष्कार ..यदि उसे लिखा न जाये तो उसके अस्तित्व का पता नहीं चल पाता ! ठीक इसी तरह यदि हम अपनी बातों को विचारों को न लिखें तो पता नहीं चलता कि हम क्या हैं? क्या सोचतें है ? क्या सोच सकतें है ? इसलिए सदियों से लिखने की परंपरा चली आ रही है ! अब यह बात अलग है कि समय के साथ लिखने के तरीके बदले , माध्यम बदले , पर लिखना नहीं रुका ! इसलिय हमे भी लिखने की आदत बनाये रखनी चाहिए न ! पहले तो होता यह था कि लिखो फिर छपवाओ , बाटों तब कुछ को ही पाता चल पाता था कि फलाने शख्स ने कुछ लिखा है ? फिर आया समाचार पत्र का जमाना ..पर उसमे लिखना ज्यादा दिनों तक याद नहीं रह पाता था ...! उसके बाद आया इन्टरनेट का जमाना ..यह वो क्रन्तिकारी माध्यम है जिसके माध्यम से हमारा लिखा लम्बे समय तक रहता है , और जब चाहे पढ़ सकतें है , उसमे अपनी प्रतिक्रिया दे सकतें हैं , जो आगे लिखने में हमारा मार्गदर्शन करतीं हैं !
तो कहने का मतलब केवल इतना ही है कि लिखने से न केवल हम अपने मन की बातें लिख कर अपने मन को हल्का भी कर पातें हैं साथ ही अपने आप को पहचान भी पातें हैं ...! और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह भी है कि हम समाज में चेतना भी जगातें हैं ! और अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को बांटते भी है ! यह हमारा कर्तव्य भी तो है न ...! उधारहण के लिए अमिताभ बच्चन को ही ले, वे प्रतिदिन अपने ब्लाग में अपने मन की भावनाओं को लिखतें है , कितने सामान्य रहतें हैं...!अपने कर्म क्षेत्र में उनका अपना अलग स्थान है न ..!
लिखने से कुछ फायदे भी होतें है ? जैसे हमारा व्यक्तित्व सामान्य रहता है , उसमे कोई दिखावट , घमंड या ऐसी कोई चीज नहीं आ पाती जो हमारे व्यक्तित्व में कहीं नकारत्मक शो करे ! हमारे अन्दर कुछ सीखने की प्रवर्ति बढती है , शब्दों पर , बोलने पर नियंत्रण करना आ जाता है ! और लिखने से कभी - कभी हम कुछ ऐसा भी लिख जातें है जिस से हम अपनी अलग पहचान भी बना पाने में सफल हो सकतें है!
तो शुरू करें लिखना ...हाँ एक बात और लिखते समय यह कभी न सोचें कि पढने वाले क्या सोचेंगे ? बस जो मन में है उसे जरा सलीके से अच्छे शब्दों में लिखतें जाएँ ..! कोशिश करें कि उसमे रोचकता हो ...! बस इतना ही ...!
शेष फिर
आपका अपना ही ---
" - ... मनु "

" दुनियां में धर्म -कर्म के सिवा अपना कुछ भी नहीं !"

" सच ही तो है ...इन दोनों के सिवा अपना है ही क्या ? और यदि हम इन दिनों में सही ताल -मेल बैठा सकें तो हमारा यह जीवन न केवल खूबसूरत हो जायेगा ! अपितु हम सदा सामान्य भी रह पाएंगे साथ ही हमारे सभी काम सफल भी होंगें ! कर्म का मतलब हमने सुना है कि जो काम हम करतें है, उसे अच्छे से करें , मेहनत से करें , मन लगा कर करें ...! है न ..! पर इसमें हम एक चीज पर ध्यान देना भूल जातें है ? और वो है अपने काम में कुछ नया करना ..! कुछ जोखिम उठाने की हिम्मत भी करना ..! अब होता यह है कि यदि हम अपने काम में इन चीजों को नहीं शामिल करते तो हम अपने कर्म क्षेत्र में अपनी पहचान नहीं बना पाते ? केवल नियमित प्रगति ही कर पातें है , जो बाद में कहीं हमारे मन में टीस पैदा करती है कि काश उस समय कुछ तो मन में था, अगर उस पर अमल किया होता, तो अपने कर्म क्षेत्र में अपना भी कुछ नाम होता ..! पर उस समय हम कुछ नहीं कर पाते ...! समय निकल चुका होता है न ..! अब यदि हम समय रहते अपने कर्म क्षेत्र में कुछ नया करने का जोखिम उठाने की हिम्मत करते तो सब कहते- वाह क्या बात है ! इतनी जल्दी यह शख्स इतना अच्छा काम कर गया ..! यही होता है कि कर्म रह जाता है ...जिससे हमारा नाम रह जाता है ..!
अब आतें है धर्म पर , लगभग हम सभी धर्म का मतलब ईश्वर की आराधना करने को ही मानतें है न ..! वैसे यह भी सही है पर इसमें भी हम कुछ बातों पर अमल करना भूल जातें है ? जैसे - हम पूजा करतें हैं , मंदिर जातें हैं , और तीर्थ -यात्रायें करतें है ! यह सब तो ठीक है पर यदि हम तीर्थ स्थलों पर उन सब की सेवा करें जो किसी न किसी चीज से महरूम हैं , जैसे अपंग, वृद्ध , कमजोर, निसहाय , गरीब , आदि ..इन्हें हम अपनत्व भरे व्यवहार का उपहार दें , और वृद्ध जनों से कुछ समय बैठ कर बातें करें , कमजोर को जिस चीज की जरूरत उस वक्त हो अपनी सामर्थ्य के अनुसार ले कर दे दें ! जो गरीब हों उनसे अपनत्व भरी बातें करके यह जाने कि उनके घर में क्या कमी है , उनके बच्चों की पढाई कैसी चल रही है ...किस स्कूल , कालेज में पढतें हैं ? जानकारी ले और अपनी सामर्थ्य अनुसार उसकी इस तरह मदद करें कि या तो उसे पता न चले और यदि पता भी चल जाये तो उसे वो अहसान न समझे ! दरअसल होता यह है कि हम स्वाभाविक रूप से बातें नहीं कर पाते ? इसलिए जब हम किसी की मदद करतें है तो उसे लगता है हम उन पर अहसान कर रहें हैं या अपने नाम के लिए कर रहें हैं ! और इस तरह हम उसके दिल में अपना स्थान नहीं बना पाते ! संत , या साधू केवल अपने व्यवहार में , बात- चीत में स्वाभाविकता बनाये रखतें है इसलिए वे सबके मन में बस जातें है ! जब कि वे धन दौलत से किसी की मदद नहीं करते , वे जिस भी धार्मिक स्थान पर जातें है स्वाभाविक रूप में रहतें है यह नहीं शो करते कि वे उस स्थान के दर्शन के लिए आयें हैं ! जब कि हम शो करतें है न ..! अब हम उन धार्मिक स्थलों में धन दौलत देने के स्थान पर जो वहां जरूरत है उसे अपनी सेवा से स्वयं पूरा करें तो उस स्थल पर हमे सब याद करेंगे न कि - कितना अच्छा व्यक्ति था खुद आ कर यह काम यहाँ के लिए कर गया ...!
तो हम इन दोनों को अपने जीवन में ठीक उसी तरह शामिल कर ले ! जैसे - धन दौलत कमाने की ललक , लोगों को खुश करने की ललक , तो हमारा जीवन और सुन्दर हो जायेगा न ..! शायद मन ही मन हम भी तो यही चाहते है न ..! "
आज इतना ही ...शेष फिर ..
आपका अपना ही ---
" - ... मनु "

Sunday, December 5, 2010

" कुछ मेरी भावनाएं है जो मुक्तक के रूप में ढल सी गई हैं , जिन्हें अपने इस ब्लाग में लिख रहा हूँ ----!"

* " उम्र के सरकते दिन ,
ग़मों को बढ़ा गए !
कहने को तो जी लिए,

फिर ऐसा जीना भी क्या ? "
-------------------

* ' चाहत के चन्द लव्जों को ,
सीने से लगाये रहे !
बस इसी वहम में ,
जिंदगी गुजर जाये !! "
----------------------

* " मुस्कुराने की कोशिशें ,
जब नाकाम होतीं हैं !
दिल फिर उन्हीं ,
वीरानों में भटक जाता है !! "
------------------------

* " प्यार की उस आखं - मिचोंनी को ,
हम खुद भी तो नहीं समझे !

लोग पूछ्तें हैं अक्सर ,
उस आगाज का अंजाम क्या हुआ ? "

" - ... मनु "

" तमन्ना "

" न देखा करेंगे ख्वाब ,
न कोई तमन्ना करेंगें !
मग़र इसी कश्मकश में
तमाम-
भूली हुई तमन्नाओं को -
ताजा कर बैठे ...!! "

" - ... मनु "

" फिर गुनगुनाएं "

" चलो आज फिर गुनगुनाएं ,
प्यार के गीतों को -
जिन्हें हम छोड़ आये थे ,
कुंजों में , गलियन में !

आज फिर महकाएं ,
उन पलों को क्षणों को ,
जिन्हें हम छोड़ आये थे -

चिंताओं में , तकलीफों में !

चलो आज फिर बतियाएं ,
उन बातों को , यादों को -
जिन्हें हम छोड़ आये थे ,
इंतजार में , अखियन में !

चलो आज फिर झिलमिलायें ,
उन तारों में , आकाश में -
जिन्हें हम छोड़ आये थे ,
दूरिओं के जंजाल में ! "

"- ... मनु "

Saturday, December 4, 2010

" याद "

" याद तो याद है याद को क्या कहिएगा !
भूलने की कोशिशें और ताजगी दे जाएँ तो क्या कहिएगा !!

है बात कुछ भी नहीं इतना वो भी समझतें हैं !
बदल रहें हैं लोग ज़माने को क्या कहिएगा !

हर शख्स है पहेली किस -किस की मिसाल दूँ !
खुद को ही ले लीजिये भला आप क्या कहिएगा !!


दस्तक - ऐ - इंतजार में क्यूँ बैठे हो !
जब वो आ जाये तो क्या कहिएगा !!

ख़त्म न होगी मेरी दास्ताँ चन्द लव्जों में !
अब चलतें हैं हम फिर कभी मिलिएगा !! "

" - ... मनु "

" आरजू "

"पूरी नहीं होती जाने क्यूँ आरजू मेरी ,
लोग शायद मुझे जीने की दुआ देतें हैं !

मुझको न मिला तो क्या दिल के करीब है इतना ,
वरना जो मिलतें हैं वे तो जुदा होतें है !


हैं वो खुशनसीब जिसे गम ही मिलतें हैं ,
ख़ुशी दे के मुकर जाये वे तो खुदा होतें हैं !

जागी - जागी सी रातें , सोये -सोये से दिन हैं ,
हमको खबर नहीं जाने कब जागते कब सोतें हैं !! "


"-...मनु

" मैं निखरता जाऊं "

" तुम जीवन बनो मैं कर्म बनूँ ,
तुम अस्त्र बनों मैं योद्धा !
तुम धार बनों मैं वार बनूँ ,
क्यों न विजित समर होगा !!
संघर्ष मुझे प्रिये होगा ,
यदि विश्वास बनों तुम !
धरा भी मैं पग से नापूं ,
यदि आकाश बनों तुम !!
सरिता की तरह बहाना सीखो तुम ,

मैं तेज प्रवाह बन जाऊंगा !
तुम जो बन सके मोती ,
मैं प्रशांत अथाह हो जाऊंगा !!
तुम बनों प्रेरणा मेरे लिए ,

मैं भी तुम्हे प्रेरित करता जाऊं !
तुम निखरो महक जीवन की लेकर ,
तुमसा मैं भी निखरता जाऊं !!"

"-... मनु "

जब " हैडिंग्स " पढ़ कर हँसतें हैं !

आजकल जिंदगी इतनी व्यस्त हो गई है कि प्रातः चाय के समय अख़बार पढ़ते समय केवल हैडिंग ही पढ़ पातें हैं .....! अब यह अलग बात है, कि पूरी खबर न पढने का शौक हो ?
ठीक है भई, पूरा समाचार पत्र भले मत पढो ? लेकिन समाचार पत्र की हैडिंग्स भी कभी -कभी मनोरंजन का ऐसा माध्यम बन जाती हैं, कि बरबस होंठों पर मुस्कराहट नृत्य करने लगती है ! यानि होता यह है कि समाचार पत्र में थोडा ध्यान दे कर पढ़ें जैसे - " पुलिस अधीक्षक का तबादला " हैडिंग लगा समाचार है और उसी पन्ने में या उसी समाचार के बगल में एक और समाचार छपा हो जिसका शीर्षक हो - " नगर में डकैतियां कम हुईं ! " तो बताइए है न मुस्कराहट लाने का कारण !
तो मैं उम्मीद रखूं न कि जब भी आप समाचार पत्र पढ़ें , भले ही आप इसे बोर या वाहियात शौक कहतें हों .... , तो कम से कम हैडिंग्स ध्यान से जरूर पढ़ें ! इससे एक फायदा होगा कि समाचार पढने से हुई बोरियत ऐसी द्विअर्थी हैडिंग्स पढने से न केवल दूर होगी, अपितु मजा भी आएगा ...! ठीक है न ..!तो आइये ऐसी ही कुछ मजेदार , चटपटी , लटपटी कुछ हैडिंग्स से आपको परिचित करवाएं -

* " बैंक में दिन - दहाड़े पांच लाख की लूट "
" ऍम .एल . ए . विदेश रवाना "

* " मंत्री का दौरा रद्द "
" नगर में गन्दगी का साम्राज्य "


* " स्कूली बच्चों को ईधन चलित वाहन न चलाने की सलाह - आयुक्त "
" मोपेड रेस : १३ वर्षीय बालक विजयी "

* " पुलिस द्वारा पत्रकार की पिटाई "
" पुलिस कर्मी पुरस्कृत होंगें "

* " मछलियों के उत्पादन में वृद्धि "
" जहरीली मछली खाने से १० मृत "

* " हर घर में नल लगेगें - प्रशासक
"पानी के लिए विवाद - २ मरे ४ घायल "

* " नगर में यातायात व्यवस्था सुधरी "
" सड़क दुर्घटना : १२ मरे "

* " पुलिस की रात्रि गश्त तेज "
" नगर में हत्याओं का दौर "


* " नारी कोमल है कमजोर नहीं "
" नारी के साथ सामूहिक बलात्कार "

* " खिलाडियों पर हमें गर्व है - मंत्री '

" क्रिकेट टीम हर कर लौटी "

* " व्यापारी नोटों का सूटकेस ले भागा "
" मंत्री जी को दो लाख की थैली भेंट "


* " मंत्री जी विदेश रवाना "
" लापता लड़की का सुराग मिला "

* " इस वर्ष फसल जोरदार होगी '
" वर्षा को ले कर किसान चिंतित "

* " खनिज विभाग : ठेके लेने में प्रतिष्ठित व्यापारियों में होड़ "
" खनिज की अवैध निकासी जारी "

तो कैसी लगीं हैडिंग्स आपको ....! मजा आया न ...!! तो जब भी समाचार पत्र पढ़ते हुए बोरियत महसूस हो तो इसी तरह की हैडिंग्स ढूंढ़ कर पढियेगा ! अपने आप न केवल बोरियत दूर हो जाएगी अपितु समाचार पत्र पढने में मजा भी आएगा ...है न ...!!!
"-... मनु "

"तुम्हारी सुन्दरता"

"जैसे प्यार नहीं छुपता ,
वैसे ही सुन्दरता छुपाये नहीं छुपती !
जैसे मुस्काना नहीं छुपता ,
वैसे ही मीठी बातें नहीं छुपती !!
इसलिए हमेशा तुम -
अपनी मीठी बातों से ,
अपनी सुन्दरता ऐसे ही बनाये रखना !!!"
-...मनु

Friday, November 26, 2010

" मुखड़ा तुम्हारा "

" सुनहली रश्मिओं में ,
ओस के धुंध के ,
आलिंगन में -
मुखड़ा तुम्हारा -
रक्तिम हो उठता है !

मीठी -मीठी सी शीत में ,
सिरहते उन पलों के ,
नैसर्गिक मिलन में -
तुम्हारा रूप -
समर्पित सा हो उठता है !

नन्ही - नन्ही कोमल दूब में ,
ओस -कणों रूपी दर्पण में ,
प्यार की चमक में -
मुखड़ा तुम्हारा -
मेरे जीवन का दर्पण बन जाता है !"
"-... मनु "

" ये देश हमारा है ..!

" पर्वतों का सा विशाल -
प्राकृतिक सौन्दर्य सा मनोरम ,
विभिन्न धर्मों से परिपूर्ण -
ये देश हमारा है !

ग्राम बाहुल्य सा भोला -
मेहनत की भूमि महकाता ,
शांति - दूत सा सुन्दर -
ये देश हमारा है !

गुलामी के अत्याचारों से -
निर्भीक , साहसी आजादी पा ,
अमर शहीद इतिहास रचता -
ये देश हमारा है !

विभिन्न रीती -रिवाजों से पूर्ण -
कला , संस्कृति और ज्ञान - संपन्न ,
मानवीयता को श्रेष्ठता मानता -
ये देश हमारा है !

संघर्ष , लगन, सयमशीलता से -
प्रगति के विभिन्न सोपान संवारता ,
सम्पूर्ण ज्ञान - संपन्न गुरु सामान -
ये देश हमारा है !


विपरीत परिस्थितिओं में -
एकता, सहयोग वातावरण पूर्ण ,
विश्व बंधुत्व का प्रेरणा स्त्रोत -
ये देश हमारा है !

भारत माता की रक्षा -
जीवन का परम लक्ष्य मानता ,
आदर्श , आदर का प्रतीक -
ये देश हमारा है ! "

"... - मनु "

" युवामन "

" आनंद - उन्मांद सा मचलता ,
कल्पना तूलिका सा ,
युवामन -
चतुर चित्रकार सामान है !

संघर्ष में तल्लीन ,
वर्तमान में भविष्य तराशता ,
युवामन -
सूत्रधार सामान है !!

असफलताओं के झंझावात में ,
शीतलता निर्मित करता ,
युवामन -
ऋतुराज समान है !!!

अन्वेषक औत्सुक सा ,
इतिहास के खालीपन में ,
वर्तमान के रंग भरता ,
युवामन -
गर्वित इतिहासकार समान है !!!! "

"...- मनु "

Thursday, November 25, 2010

कुछ मेरे शब्द :-

* " जिसके पास समस्याएं नहीं हैं , इसका मतलब कि वह खेल से बाहर हो चुका !

-"जिंदगी वह है , जो हम बनातें हैं !
ऐसा हमेशा हुआ है और हमेशा होता रहेगा...!"

-" कल्पना आपको उस दुनियां में ले जाती है ,
जो कभी भी अस्तित्व में थी ही नहीं !
लेकिन साकार होते ही वही कल्पना एक नई दुनियां बसा लेती है !! "

- " अपने सपनों पर विश्वास कीजिए ,

लेकिन आघातों में विश्वास मत कीजिए,
क्योंकि आपकी निराशा आपके भविष्य को नुकसान पहुंचा सकती है ! "

-" आदतें हमारे विचार और हमारे जीवन में जम जातें हैं !
हमारे विश्वनीय हमारे जीवन को उतना आकार नहीं देतें हैं ,
जितने कि हमारे दिमाग में रहने वाले विचार देते हैं ! "

-" आत्मा की शक्ति को लोग नहीं पहचानते ,
लेकिन आत्मा की शक्ति से ही मुश्किलों को जीता जाता है ! "

-" मन की व्यग्रता को ध्यान के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है ! "

-" जब डर का सचमुच मुकाबला करते है ,
तो हिम्मत , अनुभव और विश्वास हासिल होता है ...

इसलिए
वह काम करना चाहिए , जिसे हम नहीं कर सकते ! "

-" मैनर्स एक ऐसी चीज है किसी का भी मन मोह लेती है ,
अगर आपमें मैनर्स नहीं है , सब बेकार है !
इसलिए तो कहते हैं आपके पास कुछ हो या न हो ,
पर मैनर्स तो होने ही चाहियें !"

-" मनोबल और आत्मविश्वास ऐसे गुण हैं
जो कठिन से कठिन परिस्थितिओं में भी सफलता दिलवातें हैं !"

- " आत्मविश्वास इन्सान के अन्दर ऐसा गुण होता है ,
जो तमाम मुसीबतों में विजय पा सकता है !
यह प्रकृति प्रदत नहीं , बल्कि खुद हासिल किया जाता है ! "

-" आभावों के बीच उम्मीदों को जिन्दा रखना और उन्हें पूरा करने की हर संभव कोशिश सफलता दिलाती है ! "

-" अटूट आत्मविश्वास, सच के पक्ष में खड़े रहने का अदम्य सहस बहादुरी का प्रतीक होता है !"

- " सयम और संतुलन से काम करना ,
ताकि अपनी क्षमताओं का सही उपयोग हो सके !"

- " जो बात दिल को पसंद आये ,
उस काम को जूनून की हद तक पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए !"

-" अथाह आत्मविश्वास , ऐसा कि अपने क्षेत्र कि बड़ी से बड़ी हस्तिओं के सामने भी दम से डटे रहने कि हिम्मत आ जाये !"

अधिकार ?

" क्या हुआ जो मुझे कोई प्यार नहीं करे !
तो क्या मुझे अकेले रहने का अधिकार भी नहीं !!"
- मनु

चल अकेला

" चल अकेला फिर ऐ मेरे दिल ,
जीवन की इस लम्बी डगर पर !
सबकी यादें समेत कर ऐ मेरे दिल,
खाता चल फिर ठोकरें जीवन के सफ़र पर !!"
-मनु

हार गए

"क्या हुआ जो हम भी प्यार में हार गए ,
और रह गए अकेले !
जरूरी तो नहीं हर किसी को प्यार मिल जाये ,
और सारी खुशियाँ पा ले !!"
- मनु

काबिल नहीं मैं

" अब मन नहीं करता कि मुझे कोई प्यार करे ,
क्योंकि मैं शायद प्यार के काबिल ही नहीं !
मैं सबको खुश रखूं सब यही मुझसे उम्मीद हैं करते ,
मैं भी ख़ुशी चाहता हूँ यह कोई चाहता नहीं !!"
- मनु

Wednesday, November 17, 2010

" तुम्हारा महकता सौंदर्य "

" सुकोमल सा ,
ओस भीगे पुष्प सा -
तेरे गुलाबी मुखड़ा महकता है !

नव -प्रभात सा ,
प्रसन्नचित रश्मिओं सा -
तेरी आँखों में प्यार लरजता है !

स्वर्ण -चमक सा ,
रत्न -स्फूटित किरणों सा -
तेरा कोमल शारीर दमकता है !

मदमोहक अदाओं सा ,
शीतल मंद -मंद पवन में ,
डोलती सी डाली सा -
तेरा रंग सौंदर्य मन मोह लेता है !

कोयल की कूक सा ,
कर्णप्रिय संगीत तरंगों सा -
तेरा वाणी सौंदर्य मन बांध लेता है !

चहकना चिड़ियों का ,
स्वच्छ विचरण मनहरण मृग सा ,
तेरा नाम -
मेरी हर धड़कन पर लिख देता है !"

" -- मनु "

Tuesday, November 16, 2010

" जी चाहता है ...!"

" गहरी झील -सी पनीली ,
आँखे तुम्हारी ऐसी नशीली -
कि उनमे डूब जाने को जी चाहता है !

जीवन की मुस्कान -सी मुस्काती ,
आँखे तुम्हारी ऐसी अपनत्वभरी -
कि अपना जीवन महकाने को जी करता है !

प्यार की गहराई व्यक्त करती ,
आँखे तुम्हारी ऐसी दिल -दर्पण सी -
कि उनमे अपना प्रतिबिम्ब देखने को जी करता है !


पल
- पल मुझे अपने करीब करती ,
आँखे तुम्हारी ऐसी सम्मोहन सी -
कि सब कुछ भूल जाने को जी करता है !"

" -- मनु "

" यूँ तो तुम्हे कई बार ..."

" ख्वाबों की रंग भरी दुनियां में ,
यूँ तो तुम्हें कई बार -
रंगों से सरोबर किया है !

बसंत की हरी - भरी हरियाली में ,
यूँ तो तुम्हे कई बार -
महकता मसूस किया है !

दीपों की सुर्ख दमकती लौ में ,
यूँ तो तुम्हे कई बार -
विराहग्नि में दहकता मैंने देखा है !

बातें करते खो जाओ अपने में ,
यूँ तो तुम्हे कई बार -
मिलन के सपने देखते मैंने देखा है !

तड़प कर लिपट जाओ सपने में ,
यूँ तो कई बार -
अपने से शरमाते मैंने देखा है !"

" -- मनु "

" दोस्त "

" दूर कहीं -
धरती और आसमां मिलते हैं !
इस ज़माने में -
सच्चे दोस्त मुश्किल से मिलते हैं !
दगा को -
पाक जामा पहनाये मिलते हैं !
तो कही पे -
जान देने वाले भी मिलते हैं !
इन्सान की भावनाओं से -
खेलने वाले भी मिलते हैं !
तो कहीं -
भावनाओं में बसने वाले भी मिलते हैं !
पल -भर को -
साथ देने वाले मिलते हैं !
तो कहीं -
उम्र भर साथ निभाहने वाले भी मिलते हैं !
भगवान तो -
मंदिरों ,मस्जिदों , गिरजाघरों में मिलतें हैं !
दोस्त कहने नहीं -
निबाहने वाले मुश्किल से मिलते हैं !!"
" -- मनु
"

" अच्छा लगता है "

" पुष्पों पर चमकती-
ओस बूंदों सी ,
कोमल दूब पर दमकती -
मोतिओं सी ,
बरखा -बहार का -
मुस्कुराना अच्छा लगता है !

वृक्षों की घनी छाँव में -
इन्द्रधनुष सी ,
मन उपवन में -
मधुर स्म्रतियों सी ,
बरखा - बहार का -
इठलाना अच्छा लगता है !

पर्वत श्रेणियों को चूमती -
सम्मोहिनी सी ,
प्रकृति को आलिंगन में -
समेटती सी ,
बरखा -बहार का -
शर्मना अच्छा लगता हैं !

प्रेम में महक घोलती -
मधुर समर्पण सी ,
ऋतुओं की धडकनों में समाती -
चंचल कल्पना सी,
बरखा -बहार का-
चंचला रूप अच्छा लगता है !"
" -- मनु
"

" रूप तुम्हारा "

" तपती ग्रीष्म ऋतु में ,
कोमल रूप तुम्हारा -
शीतल छाया बन जाता है !

महकती बसंत ऋतु में ,
गुणों की महक सा,
रूप तुम्हारा -
जीवन महका देता है !


बरसती
बरखा ऋतु में ,
भीगा-भीगा सा रूप तुम्हारा -
क्षणों को यादें बना देता है !

सिरहती शीत ऋतु में ,
रक्तिम सा रूप तुम्हारा -
जीने की लालसा जगा देता है !

व्यर्थ क्यों उलझूं ऋतुओं में ,
तुम्हारे रूप सौन्दर्य के सानिध्य में-
सम्पूर्ण सृष्टि का सौन्दर्य -
मेरे जीवन की सार्थकता बन जाता है !"

"-- मनु "

" एकांत "

" दुनियां के इस -
शोर -शराबे से दूर ,
कभी -कभी मैं -
एकांत चाहता हूँ !

अपने -आप से दूर -
हो जाता हूँ दूर,
अकेलेपन में स्वयं -
मैं खो जाता हूँ !

जानता हूँ खुशियाँ ,
हैं मुझसे कहीं दूर -
फिर भी दुःख में -
मैं सदा मुस्कुराता हूँ !

पल भर साथ दे-
सब हो जातें है दूर,
कोई मेरे पास रहे -
सदा मैं यही चाहता हूँ !

ख्यालों में चला जाता हूँ -
जब मैं बहुत दूर,
तब पास सदा मैं -
अपने साये को ही पाता हूँ !"
-- मनु

" जिंदगी "

" सुना है कि हम पे ,
मेहरबां है जिंदगी !
तुम्हारे बिना मगर ,
कहाँ है जिंदगी !!

जाल हैं हर तरफ ,
यादों ने बुन दिए !

टूटे से दिल का वह ,
मुकाम है जिंदगी !!

लो डगमगा रही ,
सांसो की कश्तियाँ !
साहिल पे बनीं ,
तूफां है जिंदगी !!

जिंदगी में रहे ,
मेहमां की तरह तुम !
चल दिए तो अब ,
मेहमां है जिंदगी !!

देखो अगर तो,
पुष्प- ऐ - बहारां !
जो समझो अगर तो ,

खिजां है जिंदगी !!! "
--मनु

" कारण....? "

मैं मर जाना चाहता हूँ !
इसलिए नहीं कि -
मैं दुखी हूँ , निराश हूँ ?
बल्कि इसलिए कि मैंने -
खुशिओं के चरमोत्कर्ष का अनुभव किया है !
मैं मर जाना चाहता हूँ !
इसलिए नहीं कि -
मैं असफल हूँ , हतोत्साहित हूँ ?
बल्कि इसलिए कि मैंने -
सफलता के शिखर को छुआ है , नापा है !
मैं मर जाना चाहता हूँ !
इसलिए नहीं कि -
मैं अकेला हूँ , व्यथित हूँ ?
बल्कि इसलिए कि मै -
अकेलेपन में भी सबके साथ रहा हूँ !
मैं मर जाना चाहता हूँ !
इसलिए नहीं कि -
मैं दूसरों की लकीर पीटता हूँ ?
बल्कि इसलिए कि मैंने -
निरालेपन को मार्ग बना कर जिया है !
मैं मर जाना चाहता हूँ !
इसलिए नहीं कि -
मैं जीने के अयोग्य हूँ , लालसाहीन हूँ ?
बल्कि इसलिए कि मैंने -
जीवन को पूर्णता से जिया है !
शून्य का अनुभव किया है !!
और अब -
मुझे जीने का अधिकार नहीं है ?
इसलिए अब -
मैं मर जाना चाहता हूँ
--मनु

Monday, November 15, 2010

तुम्हारे जाने से

" साँझ का रक्तिम क्षितिज ,
विरह के दावानल सा -
दहकता है तुम्हारे जाने से !
चन्द्र किरणें बिखेरता निशाचंद्र ,
यादों के नुकीले तीरों सा -
मुझे बींधता है तुम्हारे जाने से !
प्रातः काल की मधुर सुरम्यता ,
पतझड़ में सुलगते पवन सा -
मुझे झुलसता है तुम्हारे जाने से !
तपती दोपहर का दहकता रवि ,
खंड-खंड होते मेरे अस्तित्व में ,
आड़ी-तिरछी रेखाओं से -
तस्वीर बनता है तुम्हारे जाने से !!!"

-- मनु

मेरी भावनाएं

"कौन है जिसने ,
मेरा दिल न दुखाया ऐ दोस्त !
एक तबस्सुम में ,
हर एक गम को भुला देता हूँ !!
तू तो अपना है ,
भला अपनों से शिकायत कैसी ?
मैं तो दुश्मन को भी _
जीने की दुआ देता हूँ !!!"
- मनु

ग़ज़ल

"लोगों में चर्चा मेरी आम हो गई !
सुबह हुई फिर शाम हो गई !!
उनको बहुत शक है मेरे मुकाम पर !
शायद किरण कोई गुमनाम हो गई !!
गाँव के सारे दोस्त शहरों में बस गए
हर गली सूनी मेरे नाम हो गई !!
झुकं गई थी पलके उनकी शर्म से !
हमको तो वह निगाह इनाम हो गई !!
देखा जिधर वहां खंडहर बन गए !
इस तरह से जिंदगी अंजाम हो गई !!
हमने तो खुद अपने किस्से सुनाये !
ग़ज़ल बेवजह बदनाम हो गई !!
-मनु

"प्यार : जीवन का इन्द्रधनुष"

"प्यार " एक ऐसा शब्द है जो मानव जीवन की धड़कन होता है ! हर रिश्ते की जान होता है ! यह जान अगर निकल जाये तो रिश्ते रूपी वृक्ष बिलकुल ऐसे लगतें है न जैसे पतझड़ में सूखा सा...., निरीह सा...., बेजान सा ठूंट सा...! जब हम अपने जीवन में उम्र के उस मोड़ पर पहुँचते हैं जहाँ हमे लगने लगता है की हमारे मन में कोई बस सा गया है , किसी को हम प्यार करने लगे हैं ..और कोई हमे प्यार करने लगा है . तब हमारा मन अपने अन्दर जिंदगी का एक ऐसा आनंद महसूस करने लगता है जो हमारे अन्दर एक नई शक्ति भर देता है ...एक ऐसी शक्ति जिसके कारण हमे लगने लगता है कि हम बदल से गए हैं ..!कितना अच्छा सा लगता है न अपने अन्दर यह बदलाव ..!!मन करता है हम इसी में हमेशा रहें और अपने जीवन को बिता दें ! सच ही तो है कि प्यार में इतनी ताकत होती है कि जो कभी मुस्कुराता नहीं है उसे मुस्कुराना आ जाता है , मन में उम्मीदों की , अरमानों की लहरें उठने लगतीं हैं जिसके कारण हमे यह दुनियां अच्छी सी लगने लगती है ! कहा भी गया है न कि- " प्यार में वो ताकत होती है कि दो देशों की दुश्मनी भी समाप्त हो जाती है !" जैसे किसी के भी दो पहलू होतें है उसी तरह प्यार के भी दो पहलू होतें हैं - " सकारात्मक और नकारात्मक " ! यदि प्यार हमारे जीवन में सकारात्मक रूप से रहा तो जीवन सफल सा लगता है ! इतिहास गवाह है जिसे प्यार मिला उसने इतिहास में अपना सुन्दर सा स्थान बनाया ! जैसे - ताज महल , प्यार का स्मारक ! इस प्यार में इतनी शक्ति होती है कि जिसे मिला वह अपने क्षेत्र में नाम बना पाने में सफल हो गया , जैसे - सचिन तेंदुलकर, कपिल देव, राजीव गाँधी. इंदिरा गाँधी , धर्मेन्द्र , देव आनंद ...जैसे अनेक लोग हैं ! अब अगर प्यार नकारात्मक रूप ले ले तो भी इतिहास बन गए ! जैसे - हिटलर, अल्फ्रेड हिचकाक, ओसामा बिन लादेन , आदि ! यदि हम अपने मन से सोचें तो अपनी स्थिति के बारें में हम अपने से ज्यादा जानतें है न ...! हमे प्यार हुआ है या नहीं , यह प्यार हमने कैसे महसूस किया , इसने हमारे मन पर कितना असर डाला है, हम कितना प्यार करने लगे हैं , हमारी जिदगी में प्यार का क्या असर हुआ है ? क्या हमने जो अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है क्या उस पर कोई असर हो सकता है ? अपने दैनिक जीवन में क्या अंतर हम महसूस करतें हैं ? आदि अनेक बातें होती है जिस से हम इस प्यार को समझ सकतें है ..और फिर जिस से हम प्यार करतें हैं क्या वो भी हमे उतना ही प्यार करता है जितना हम करतें हैं ? बस यही वो समय होता है जहाँ से हम सकारात्मक होतें है या नकारात्मक ! फैसला हम पर होता है !! जीवन के इस दोराहे पर बहुत कठिन होता है सामान्य रह पाना ? यदि जो हमारा प्यार सकारात्मक है तब तो लगता है कि जीवन में इन्द्रधनुषी रंग भर गए हैं , और मन हर वह काम करने में सफल हो जाता है जो न केवल हमे अच्छे लगतें है बल्कि सबको अच्छे लगतें है , और अगर हमे अपने प्यार का पूरा साथ और उत्साह मिल जाये तो हमे लगता है हम भी कुछ ऐसा कर सकतें हैं , कि हम भी इतिहास में अपना स्थान बना सकतें है ...और जब मन में इस तरह का विचार आ जाये तो हमारे अन्दर आत्मविश्वास बढ सा गया है कुछ ऐसा महसूस होता है न ...! इस समय यदि हम थोडा सा प्रयास करें तो कोई मुश्किल नहीं कि हम भी इतिहास में अपना नाम नहीं लिख सकते...!! यह है प्यार कि ताकत का एक नमूना जो हर कोई चाहता है उसके जीवन में आये ! यह या नहीं ..!! अब आतें हैं प्यार के नकारात्मक पहलू पर - यहाँ कई स्थितियां आती हैं - हो सकता है जिसे हम प्यार करतें है वो कुछ समय तो यह व्यक्त करता है कि वो भी हमे प्यार करता है पर कुछ समय के बाद उसका व्यवहार बदल जाता है और प्यार एक तरफ़ा ही रह जाता है ! हो सकता है कि कोई हमसे प्यार करता है और हम उसके प्यार को समझ नहीं पाते? या यह भी हो सकता है कि समाज , धर्म , अमीरी - गरीबी आदि के कारण हम अपने प्यार को उस तरह व्यक्त नहीं कर पाते जैसा हमे करना चाहिए ? इन परिस्थितिओं में मन कहीं से टूट सा गया है नहीं लगता ? सबसे कठिन स्थिति तो तब होती है जब हम प्यार करतें है और वो भी हमसे प्यार करता है पर कुछ समय के बाद कहे कि हम प्यार नहीं करते ? यही वो स्थिति होती है जब न केवल मन टूट सा जाता है अपितु जीवन का उत्साह भी खत्म सा होने लगता है ...!मन करता है कि हम क्यों है इस दुनियां में ? जैसे तैसे मन कि इस अवस्था पर काबू पा भी ले तो जीवन में वह आनंद नहीं रह जाता जिसे वास्तव में जीवन कहतें हैं ! यहीं से शुरू होता है मन में नकारात्मक उर्जा का बनना ! और यदि मन ठान ले तो हम अपना नाम इतिहास में नकारात्मक ढंग से लिखा पाने सफल हो सकतें हैं ...!!! कितना अजीब है न यह प्यार भी ...जिसे मिल गया उसे लगता है उसे जीवन मिल गया और जिसे नहीं मिला या बीच रस्ते में छोड़ गया उसे लगता है कि उसे जीवन ही क्यों मिला ? अगर आपके जीवन में कभी ऐसा कुछ आपने महसूस किया हो तो उस पर अकेले में विचार करें और सोचें क्या करना है ..हाँ प्रयास करें कि नकारात्मक को अपने ऊपर हावी न होने न दें क्योंकि हमे जो यह जीवन मिला है उसे यूँ ही गवां देना अपने आप को धोखा देना होता है ! इसलिए इस स्थिति में सामान्य बनने की कोशिश नए जीवन की राह भी बनती है , हाँ थोडा मुश्किल जरूर होता है ..पर कोशिश से क्या नहीं होता ...! हाँ यहाँ एक बात जरूर होती है कि हमारा मन फिर किसी को प्यार नहीं कर पाता ? सही भी तो है प्यार एक ही बार होता है बार बार नहीं ! चलिए अब रोकता हूँ अपने शब्दों को, कहतें है न कि जब मन भर जाये तो शब्द अपने आप रुक जातें हैं ..और मन करता है शब्दों से दूर कहीं अकेले में चले जाएँ ...! है न ...तो बस इतना ही ....!
"-.....मनु भारतीय"

Saturday, November 13, 2010

"स्वभाव : मानव जीवन का दर्पण "

"स्वभाव : मानव जीवन का दर्पण "

"मानव का स्वाभाव उसके मन की स्थिति , दिमाग की दशा , और आस- पास के वातावरण से नियंत्रित रहता है .!" इनमे से एक भी दशा संतुलित नहीं हुई तो स्वभाव अपना स्वरुप बदल देता है ! और तब स्वभाव इनको नियंत्रित करता है , अब यह बात अलग है कि स्वभाव की दशा क्या है ? मुख्यतः स्वभाव की कुछ दशाएं होती हैं -- शांत , प्रसन्न , दुखी , और उदासीन ...! मानव जीवन की दशा का निर्धारण भी स्वभाव करता है ! इसलिए कहतें हैं न कि " बालपन में स्वभाव को जिस रूप में ढाला जाये वह वैसा ही बनता है !"
जीवन में स्वभाव में बदलाव की अनेक अवस्थाएं आती हैं .! सबसे पहले 'बालपन' की अवस्था आती है , उसके बाद 'किशोरावस्था' की अवस्था आती है , जिसमे हम अपने 'बालपन ' की चंचलता को कम करते हैं! उसके बाद 'जवानी ' की अवस्था में अपने -आप को पहचानने के स्वभाव को विकसित करतें हैं ! यही वह दशा होती है जहाँ से भविष्य का निर्धारण होता है ! इस समय लिए जाने वाले निर्णय न केवल स्वभाव को पूर्णतः बदल देतें हैं अपितु 'स्वयं ' की पहचान भी कराते हैं ! इस समय 'स्वयं ' को ध्यान में रख कर लिए गए निर्णय भविष्य में महसूस होने वाली किसी भी निराशा या अफ़सोस को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाहता है.! क्योंकि यहाँ से नवजीवन भी तो प्रारंभ होता है न ...! और वरिष्ट परिजन हमसे यही उम्मीद करतें हैं कि हम उनके दबाव में न आयें ...उनकी पसंद में न ढलें...स्वयं की इतनी सक्षमता दिखाएँ कि उन्हें भी अहसास ही नहीं अपितु विश्वास हो जाये कि हम जीवन में स्वतंत्रता से अपनी पहचान बना सकतें हैं ...! यही पहचान हमारा भविष्य भी बनती है ! कार्य क्षेत्र में असीमित शक्ति का माध्यम भी बनती है ! और यदि हम ऐसा करने में सफल होते हैं तो हम अपने जीवन में इन बातों को याद कर अफ़सोस या दुखी न होंगे कि -' उस समय जिसको हम बहुत प्यार करते थे , और जो हमारा बहुत ध्यान रखता था या थी उसे पहचाने में चूके और अपना साथी नहीं बना पाए , उस समय थोड़ी हिम्मत दिखाई होती पहचानने में , और उसे अपना बना लेते तो आज यह समय न देखना पड़ता !" और यदि हमारी यह स्थिति हमारे परिजन देख ले तो उन्हें भी महसूस होगा कि उस समय बनाया गया दबाव उनकी निश्चिन्तता पर प्रश्नचिन्ह बन गया है ? इससे वे इतने व्यथित हो जातें हैं कि मन मसोस कर जातें है और हम उनकी मानसिकता भी नहीं पढ़ पाते...! समय के साथ वे अपनी इस अतृप्त इच्छा के साथ समय से दूर चले जातें हैं ...बहुत दूर ...जहाँ हम उन्हें देख तो पाते नहीं ...केवल उनकी याद ही कर सकतें है ..! बाद में जब हम उनकी अवस्था पर पहुंचते हैं तो अहसास होता है कि हमारे माता -पिता क्या नहीं
कह पाए थे हमसे ..? इसलिए इस अवस्था में अपना स्वभाव पहचानना , निर्णय लेना स्वयं के प्रति अनिवार्य होता है ! यदि हमने "स्वयं का निर्णय लिया तो आगे के स्वभाव में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं आता जिससे विचलन का सामना करना पड़े ! क्योंकि माना गया है कि "स्वयं " से लिए गए निर्णय में ऐसी असीमित शक्ति निर्मित होती है जो आने वाली कठनाइयों को इतनी सरल बना देती है कि पता ही नहीं चलता ..!" यदि स्वयं के निर्णय के विरुद्ध निर्णय लिया तो नवीन परिवार के निर्माण के समय स्वभाव में उदासीनता आने लगती है और यह उदासीनता जीवन भर चलती रहती है ..! जो अंत में अहसास कराती है कि 'काश ' स्वयं का निर्णय लिया होता तो जो जीवन उदासीन सा बीता, उसमे रंग होते ...! सपने होते ..! उत्साह होता ..! प्यार होता ....! निर्लिप्त ख़ुशी होती ..! जिससे जीवन कब और कैसे बीतता पता ही न चलता ...!! मानव जीवन इसी जीवन की कल्पना करता है न ..! तो इसका निर्धारण भी उसे ही करना पड़ेगा न ..! " सही समय पर हिम्मत के साथ ...और विश्वास के साथ ..! " कहतें भी तो है न कि - " सही समय पर स्वयं का निर्णय कुछ खोता भी है और यह खोना भविष्य की ख़ुशी का आधार होता है !" इसलिए उस समय 'कुछ खो' कर सारे जीवन 'सब कुछ ' पाना अच्छा है न ....!!!
अभी इतना ही .....अगली बार फिर एक नए विषये के साथ ....आऊँगा आपके सामने ......
"---मनु भारतीय "

Friday, November 12, 2010

"परिवार : संसार का जीवन "

"परिवार : संसार का जीवन "
"परिवार" कितना अर्थपूर्ण शब्द है ..! इसी शब्द से संसार की हर गतिविधि चलती है ! कितने ही रूप होतें है न इस एक शब्द के ..! नि:स्वार्थ , स्वार्थ , परोपकार , कर्तव्य , बलिदान , नैतिकता , अपराध , पुण्य , भक्ति आदि ..! अनेक शब्दों की परिभाषा होता है यह शब्द ! शायद यही एकमात्र शब्द है जिसके इतने पर्याय हैं , अर्थ हैं ! वर्ना संगीत के सात सुर होतें है ! रस नौ प्रकार के होतें हैं ! कामक्रीडा के चौसंठ आसन होतें है ! चार वेद , नौ उपनिषद , सात महाद्वीप , ताश के बावन पत्ते आदि अनेक की कोई सीमा जरूर होती है ..! परन्तु 'परिवार' की सीमा नि:सम्मी होती है ! जैसे आकाश में अनंत तारे , पेड़ों की पत्तियां , धरती के असंख्य कण...आकाश में अनगिनत बादलों के झुण्ड ..! ठीक यही अर्थ भी परिवार पर लागू होता है न ..! आकाश के तारे... कोई कम चमकीला तो कोई ज्यादा , कोई छोटा तो कोई बड़ा ..! और जब तारे एक साथ रोशन होतें है तो अँधेरा दूर भाग जाता है ..! ठीक यही बात भी परिवार पर भी लागू होती है न ...! जब परिवार एक होता है तो निराशा दूर हो जाती है! कितना अजीब है न यह सब ...!
परिवार की शुरुआत दो अंजन से होती है ...उनमे प्यार होता है ..प्यार परवान चड़ता है ...एक होतें है ...और शुरू होता है परिवार ..! समय चक्र की गति से भी तेज गति से परिवार बढता है .! समय के साथ बढता यह परिवार आपस में दूरियां भी बनता है न ..! जैसे आकाश में तारों के बीच , वृक्षों की पत्तिओं के बीच , आकाश में बादलों के बीच दूरियां ...जो कभी ख़त्म नहीं होतीं ! जब आकाश में बादलों के झुण्ड आपस में टकराते हैं तो गडगडाहट से बिजली चमकती है और बरसात होती है ! इसी तरह परिवार में जब दो 'अहं' आपस में टकराते हैं तो विखंडन होता है ...! परिवार में केवल एक ही सम्बन्ध अटल रहता है और वो है - 'पति- पत्नी ' का ! जैसे आकाश में चाँद -तारे का , वृक्ष में पत्तियों और डाली का , ..! शेष सभी रिश्ते समय के साथ दूरियां बनातें हैं वैसे यह दूरियां सही भी है न ..! तभी तो नए परिवार की शुरुआत होती है ..! अब परिवार से दूरी उनकी मर्जी से बनाये या स्वयं की हिम्मत से बनाये ! बनाना तो परिवार ही होता है न ! आपसी विश्वास , समर्पण और सहयोग इसकी धड़कन होती है न .! जैसे तने से डालियाँ तब तक जुडी होती हैं जब तक उन पर ताकत का उपयोग न किया जाये ! ठीक इसी तरह यह सम्बन्ध भी मृत्यु रूपी शक्ति से ही अलग हो सकता है ..!

तो क्यों न परिवार से अपने साथ- साथ प्रक्रति के जीवन में भी नई जान डालतें रहें ...! ता कि यह दुनियां इतनी सुन्दर हो कि बार-बार इसमें आने का मन करे ....! दिल करे ...!! सच कह रहा हूँ न मैं ...!!!
तो अब इतना ही फिर मिलूँगा एक नए विषय के साथ ...!!!! "- मनु भारतीय"

"रिश्ते कितने अजीब होतें हैं !"

"रिश्ते कितने अजीब होतें हैं !"
सच
में रिश्ते अजीब से नहीं होते ...? इतने अजीब कि कभी -कभी लगता है इन्हें रिश्ते ही क्यों कहते हैं ? शायद रिश्ते निज स्वार्थ की पूर्ति का माध्यम होते हैं ! "मन " भी कितना " अपना " सा होता है , जब तक इसे ख़ुशी मिलती है इसे हर चीज अच्छीही लगती है ! परन्तु जब "मन " को कोई चीज अच्छी न लगे या उसे किसी रिश्ते से, किसी बात से, या किसी अन्य माध्यम से चोट सी लगे तो ...."मन " महसूस करता है कि वह इस शरीर में ही नहीं है ..! जाने कहाँ -कहाँ खो सा जाता है न ..! इसलिए कहतें हैं न - " मन के हारे हार है मन के जीते जीत " ! वैसे भी किसी ने सच ही कहा है कि -" दिमाग से कम करने से स्वार्थी बनने से न केवल जीवन सुखी होता है बल्कि सभी 'पूछते ' भी हैं ...! ख्याल भी करते हैं ...!! " और जो मन से, दिल से जीवन जीता है वह सदा 'अकेला ' ही रहता है ..! उसे कोई "कीमत " नहीं देता , महत्त्व नहीं देता और जीवन की खुशियाँ केवल 'मन ' को छू कर चली जाती हैं ! उसके साथ नहीं रहती हैं न ..! कितनी अजीब बात है न ..कि एक ही शरीर में दोनों के दो स्वरूपों का होना ..? एक से जीवन खुशहाल होता है तो दूसरे से अकेला ? ऊपर से लोग कहतें हैं -" रिश्ते मन से बनाये जातें हैं न कि दिमाग से ?" समझ नहीं आता जीवन किसके सहारे जियें - 'मन ' से यस 'दिमाग' से ? रिश्तों से जीवन सुखी हो क्या यह जरूरी होता है ? मैंने अपने अब तक के जीवन में यही महसूस किया कि -" दिमाग को सयम में रख कर मन से दिल से कम करें !" मैंने इसका पालन किया , शायद इसी कारण मैं सबके साथ रह कर भी अकेला ही रहा हूँ ...सबसे अलग ..! मेरे मन की एक ख्वाहिश --' मेरा कोई ध्यान रखे , मुझसे प्यारी सी बातें करे , केवल मुझे प्यार करे , " कब पूरी होगी ? पता नहीं , जीते जी या फिर ....? चाहे पूरी हो या न हो मैं अपना जीवन, अपने रिश्तों को 'मन ' से जियूँगा , न की 'दिमाग' से ! हाँ अपने कार्यों को दिमाग से करूंगा ..! पर उसमे भी 'मन ' शामिल रहेगा ! क्योंकि दिमाग सब सही माने और मन नहीं ..तो कम कैसा ? सच है न ...तो अब अपने शब्द यहीं रोकता हूँ ..फिर मिलूँगा ........! "-मनु भारतीय"

Sunday, August 1, 2010

"FRIENDSHIP"

"The language of friendship is not words but meanings"
"
Advice from your friends in like the weather, some of it is good, some of it is bad."

These are some words tell by good thinkers, if we follow then we make good friendship in our life, so keep friendship but dear be careful for making friends...make ashore that you know about your friend , like himself, family back ground, family members ..income sours , education, his/her nature of thinking, value of behavior, his/her way of express words..language knowledge...!

We know that relationship is give us value of life because single person is not able to do any thing, so we want any who give us morale support, encouragement, and company when we want , and like these relationships have many shapes, like husband-wife, mother-father, brother-sister, girl friend-boy friend, and many more.

If we get good friend then we active any success that we want, good friend encouraging us for good work he/she did not create negative environment around us , also they give us healthy mental support, and by this we get power that we didn't see but by that power we fight to unsuccessful time of life.

So on friendship day Annaliese your self and your friends, and try to find good results..with this hope..Happy Friendship Day ......!!!

-manubhartia