Tuesday, December 28, 2010

सकारात्मक दृष्टिकोण

" हमे कभी कभी लगता है न हमारा कोई काम होने वाला था पर नहीं हुआ ? हम सोचतें हैं कि उस काम को करने में हमसे कोई त्रुटी तो नहीं हुई .? पर बहुत सोचने के बाद हम तय करतें हैं न कि हमसे तो कोई गलती नहीं हुई फिर काम क्यों नहीं हुआ ? दरअसल होता यह है कि जब हम उस काम को कर रहे होते हैं, तो हम काम तो कर रहे होते हैं, पर अपने अन्दर अपने काम के प्रति सकारात्मकता के स्थान पर यह सोचतें है -कि पता नहीं हमारा यह काम होगा या नहीं ..? और इस अनिश्चितता के कारण न केवल हमारे अन्दर नकारात्मक भाव बढते हैं , अपितु काम के होने में भी रूकावट बन जातें हैं ! और जब काम नहीं होता, तो हम उस समय सोचतें हैं - कि काश उस समय हम अच्छा -अच्छा सोचते तो काम हो जाता ! यही अच्छा -अच्छा सोचना ही सकारात्मक भाव होता है , फिर हम सोचतें है आहिंदा हम सकारात्मक ही सोचेंगे ..! पर फिर हम भूल जातें हैं क्यों कि हम इसे अपनी आदत में या मानसिकता में ढाल नहीं पाते न ..! यह तो हुई कि हमारे कामों के सही ढंग से होने में सकारात्मक भाव की अहम् भूमिका होती है !
अब आते हैं इस सकारात्मक भाव का असर कितना अच्छे से हो सकता है ? यदि हम किसी चीज को पाना चाहतें है तो हमे अपने दिमाग में उसकी तस्वीर बनाये रखनी चाहिए और सोचना चाहिए हमे यह चीज मिल ही जाएगी ! यदि हम लगातार ऐसा करते है और फिर उस चीज को पाने का प्रयत्न करतें हैं तो निश्चित मानिये हमे वह चीज मिल ही जाती है ! तब हम खुश होते है कि हमे कितनी आसानी से चीज मिल गई! दरअसल होता यह है कि हमारे लगातार सोचने से , अपने दिमाग में उस वस्तु की तस्वीर बनाये रखने से हमारे आस -पास सकारात्मक उर्जा का वातावरण बन जाता है और यही वातावरण उस चीज को पाने की लालसा में जूनून पैदा करता है , और यही जूनून वस्तु पाने की सही दिशा बनता है ! और हम उस वस्तु को पा लेतें है !
हमारे आस -पास कितने ही ऐसे उधाहरण होते है जो सकारात्मक भाव से अपने सब काम करतें है ! हम उन्हें देख कर कहतें हैं कि - इनके सब काम कितनी आसानी से हो जाते हैं ..? उनके सब काम आसानी से होने के पीछे यही सकारात्मक भाव ही होता है ..! यही बात रत्नों पर भी लागु होती है ! जब हमे कोई ज्योतिष या रत्नों का जानकर हमे रत्न देता है यह कह कर कि इसे धारण करने से आपके सब काम अच्छे से होंगे साथ ही मन भी शांत रहेगा ! हम उस रत्न को सकारात्मक भाव से धारण करतें है और अपने काम उस रत्न को याद कर करते हैं और जब हमारे काम सफल होते है तो उसका श्रेय उस रत्न को देते है कि हमने वह  रत्न पहना तो हमारे काम सही ढंग से हुए ! दरअसल होता यह है कि वह रत्न तो केवल माध्यम होता है हमारे अन्दर सकारात्मक भाव बनाये रखने का ! ऐसे अनेक माध्यम हमें प्रेरित करते है कि हम अपने अन्दर सकारात्मक भाव सदा बना रहे ..! जैसे भगवान की भक्ति , संकीर्तन करना , बड़े - बुजुर्गों द्वारा अच्छे वचन कहना ...आदि आदि ..!
तो उम्मीद करूँ न कि कम से कम इस आने वाले नए साल में हम यह प्रण ले कि हम अपने सब कम अपने अन्दर सकारात्मक भाव बना कर करेंगे !!!
"... - मनु "

No comments:

Post a Comment